रविवार, 28 नवंबर 2010

खोटी बचप्पन

ये दुनिया अपने बीते बचपन के लिए आह भरती है,
पर कुछ के बचप्पन रहते आह निकलती है ,

खिलौनों से खेलने वाले हाथो से, है  भीख मांगते,
इन नाजूक दिमागो पे, जो परियो की कहानी की दीवानी होती है ...........
है ज़माने की मार झेलते,
ये क्या  जाने , क्यू तरसती है ये दुनिया बीते बचपन के लिए ,
ये तो ऐ भी नहीं जानते ये है कौनसी बला .....
इनकी समझ से माँ क गोद और दुघ के दिन ही है बचप्पन,
ये क्या जाने नानी दादी माँ की लोरी और कहानियाँ भी है बचप्पन.......

इन्होने पैर जमीं पे पड़ते ही ,पकड़ा है हाथो में कटोरा ,
या ....
निकल पड़े है, झोला लिए कुडो की ढेरो की ओर
हाय री किस्मत ,
तुने क्यों इन्हें अमीर शहजादो की गन्दगी धोने के लिए छोरा.....
क्या इनकी है ये गलती ,या इन्होने पैदा होने के लिए गरीब माँ का गोद चूना
                    हाय री किस्मत  तुने क्यों इनका साथ छोरा .........क्यों छोरा,
क्यों साथ छोरा