मेरा मन है एक बच्चे का
जिसने बच्चपन जाना है ,
जब देखता है ये ,अपने हमउम्रो कोश्रमिक या भिखमंगे क रूप में,
तड़प उठता है ये ,पूछता है .......आखिर इनका दोष क्या है .........?
समझाता हूँ इसे
..ऐ ,तू इनके बारे में सोचता क्यों है
पर मेरा मन मुझे ही जवाब देता है .......
की सोच आखिर इनका दोष क्या है ?
जब तू छोरता है बिछौना ...
ये निकल चुके होते है कुडो की ढेरों की ओर ,
जब तू निकलता है स्कूल को
ये निकल चुके होते है कल -कारखाने को ..
क्या शिक्षा इनका अधिकार नहीं ..........
क्या तेरे जैसा बचपन इनके भाग्य में नहीं ?
सोच की आखिर इनका दोष क्या है?.......
.आखिर इनका दोष क्या है ,,...................??
जिसने बच्चपन जाना है ,
जब देखता है ये ,अपने हमउम्रो कोश्रमिक या भिखमंगे क रूप में,
तड़प उठता है ये ,पूछता है .......आखिर इनका दोष क्या है .........?
समझाता हूँ इसे
..ऐ ,तू इनके बारे में सोचता क्यों है
पर मेरा मन मुझे ही जवाब देता है .......
की सोच आखिर इनका दोष क्या है ?
जब तू छोरता है बिछौना ...
ये निकल चुके होते है कुडो की ढेरों की ओर ,
जब तू निकलता है स्कूल को
ये निकल चुके होते है कल -कारखाने को ..
क्या शिक्षा इनका अधिकार नहीं ..........
क्या तेरे जैसा बचपन इनके भाग्य में नहीं ?
सोच की आखिर इनका दोष क्या है?.......
.आखिर इनका दोष क्या है ,,...................??